मुझे गिला नहीं …

मुझे गिला नहीं कि तूँ बिछड़ गया 

टीस ये है तूँ मेरा कभी था ही नहीं

मैं जानता था की सच का रस्ता होगा दुश्वार 

मगर तूँ उस राह का मुसाफ़िर कभी था ही नहीं 

लगता  था मंज़िल-ए – मुक़्क़दस तेरे कदम चूमेगी 

मगर तूँ उस मंज़िल का तलबगार कभी  था ही नहीं

सोचता था चोटियों पे फहरायेगा तूँ अपना परचम  

मगर उन बुलंदियों का तूँ कभी हक़दार था ही नहीं 

उम्मीद थी तूँ बनेगा मेरा पुर ख़ुलूस हमसाया 

ये ख़बर न थी तेरा साया भी तेरे साथ नहीं 

-दुश्वार = मुश्किल 

-मंज़िल-ए-मुक़द्दस = पाक पवित्र मंज़िल 

-तलबगार= इच्छुक 

-परचम = झंडा 

-पुर ख़ुलूस= उदार, निश्छल 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

2 thoughts on “मुझे गिला नहीं …

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