ख़ुद को ही समझ बैठे ख़ुदा

देखता हूँ जब किसी का अंधा गुरुर,

सोचता हूँ कैसा है यह ज़हरीला सरूर,

जिसमें आदमी किसी को आदमी न जाने,

हर किसी को वह बौना और गौण माने,

ख़ुद को ही समझ बैठे ख़ुदा,

और यूँही खुदाई से हो जाए जुदा,

कितनों को यह ग़ुरूर है ले डूबा,

फिर भी इस नशे से नहीं है मन ऊबा,

क्यों नागवार गुज़रती है झुक के जीने की बात,

चाहे कितनी भी लंबी हो जाए काली स्याह रात,

आओ, झुके पके फल से कुछ सीखा जाए,

ज़हीन और हलीम लोगों से हम यह गुर पाएँ,

सबसे ऊँचा होता है झुकने वाले का क़द,

झुठला न सके कोई इस सच को, न कर सके रद्द!

झुकने वाले के हिस्से नहीं आती कोई ख़राब घड़ी,

उसके साथ तो है मुसलसल सारी कायनात खड़ी!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

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