तूँ तो सन्मार्ग का पथिक ठहरा

बन उजाला जग को दिखा राह,

न हो मन में तेरे कोई और चाह,

उठा हर गिरे हुए को बाँह पकड़,

उदासीनता की न हो तुझ पे कोई जकड़,

बन मरहम हर किसी के घाव का,

माँझी बन मँझधार में फँसी हर नाव का,

बुझा ज्वाला बन धधकती हर आग को,

तज दे हर कटुता को और द्वेष राग को,

तूँ तो सन्मार्ग का पथिक ठहरा,

सत्य ध्वज आकाश में ऊँचा फहरा,

हर भटके जहाज़ का तूँ बन ध्रुव तारा,

इसी सार्थकता में है छुपा जीवक सार सारा,

निमित बन तूँ हर ईश्वरीय कार्य का,

धर्म इसी को जान हर वीर आर्य का!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

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