मैंने जब उस अजनबी को गले लगाया.
पहले तो वह ठिठका, फिर मुस्कुराया,
बोला,” क्या है इसमें तुम्हारा मतलब,
या फिर है यह कोई तुम्हारी गफ़लत?
दिल का सहरा तो इक-इक बूँद को तरसे,
आज मोहब्बत की बरखा यहाँ कहाँ है बरसे,
जब बंद आँखों से हर कोई अंधी दौड़ में भागे,
तुम्हारी आँख खुली कैसे, कैसे तुम जागे?
आज जब हर कोई ख़ुद को ख़ुदा है जाने,
कौन किसी को है जाने, कौन है माने?
लगता है किसी और दुनिया से हो तुम उतर आये,
जहां नहीं ख़ुदपरस्ती के गहराते डसते साये,
जहां प्यार की मीठी नरम धूप है खिलती,
जहां शिद्दत से रूह रूह से आज भी मिलती,
अगर यह सच है तो न करो ख़ुद को ज़ाया,
क्या करोगे यहाँ हासिल जब किसी और ने कुछ न पाया,
उल्टे पाँव लौट जाओ है जहां भी तुम्हारा ख़ुशनुमा वतन,
यहाँ कुछ नहीं बदलेगा, न करो तुम कोई यतन!”
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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👌👌👌
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Thank you very much, Ankit dear, for appreciating the composition! Stay blessed.
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Nice ❤️
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Thanks a lot, Sahil dear! Happy to see that a nice person has found the poem nice!😊
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