बहरों की इस दुनिया में कौन सुनेगा तुम्हारे गीत,
पत्थर दिल इंसानों में कौन बनेगा तुम्हारा मीत,
चिलचिलाती इस धूप में कौन बनेना तुम्हारी छाँव,
सहरा की इस गरम रेत में कहाँ टिकेंगे तुम्हारे पाँव,
शोरोगुल के इस जंगल में कौन सुनेगा तुम्हारी तान,
कौन समझेगा मोल तुम्हारा चाहे हो तुम गुणों की खान,
तुम्हारे रिसते ज़ख्मों पे मरहम कौन लगाएगा,
बुझते हुए तुम्हारे दिल में शमा कौन जलायेगा,
मद्धम पड़ती इन साँसों में कौन फूँकेगा फिर से जान,
ख़ुदगर्ज़ी के इस आलम में कौन बढ़ाएगा तुम्हारा मान,
कौन समेटेगा तुम्हें जब रेशा-रेशा तुम बिखरोगे,
सूख गये इस गुलिस्ताँ में कैसे तुम अब निखरोगे,
किसे तवक्को थी इस दुनिया की जिसमे आज हम जी रहे,
किसे खबर है कैसे यह ज़हर का प्याला पी रहे,
कैसा अजब यह आलम है यह ख़ुदा ही जाने,
जहां विरला कोई किसी को समझे, कुछ है माने!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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बेहद खूबसूरत कविता 👌👌
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धन्यवाद, मीनाक्षी जी! आपने मनोबल बढ़ा दिया।
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Nice sir❤️
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Thank you, Sahil dear! Stay blessed.
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भावपूर्ण कविता। बहुत सुंदर।👍 🙏💐
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धन्यवाद, ममता मैडम! कविता भाव प्रधान तो होती ही है, ख़ुशी इस बात की है कि आपको अच्छी लगी!
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Nice sir all the lines are true lines💯❤
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Thank you, dear! God bless you!
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Bahut hi sundar Kavita he Sir aur aaj ki sachai
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धन्यवाद, स्नेहलता मैडम! जिस सच्च को कविता बयान कर रही है वह आज का कड़वा सच्च है, पर सच्च तो सच्च ही है और उसे स्वीकार कर उसमें से कुछ अच्छा निकालने का प्रयास ही कर सकते हैं।
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