आओ फिर बच्चे बन जाएँ

आओ फिर बच्चे बन जाएँ,

चंदा मामा से बतियाएँ,

उड़ें पवन के साथ

डाल हाथों में हाथ,

कोई भेद-भाव न जानें,

सबको अपना ही मानें,

अभी रूठें, , अभी मन जाएँ,

सबसे प्यार हैं पाएँ,

बालक बन जाएँ अबोध,

फैलाएँ हर्ष और प्रमोद,

फिर से पक्के दोस्त बनाएँ,

एक-दूजे पे वारी जाएँ,

बीती बात का न बोझ उठाएँ,

नित नए बन जाएँ,

बचपन का क्या कहना,

वो तो है जीवन का गहना,

हमारे अंदर जो बच्चा पलता,

सदा रहे वह फूलता-फलता,

मीठी लोरी उसे सुनाएँ,

लाड़ करें और उसे रिझाएँ,

देखें, कहीं न जाए खो

हमारे जीवन की है वह लौ!

बाल दिवस पर हम सब के अंदर छिपे प्यारे नन्हे से बालक को समर्पित है यह रचना!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

7 thoughts on “आओ फिर बच्चे बन जाएँ

  1. बहुत उम्दा लिखा है सर। बचपन सबसे अनमोल और अच्छा होता है। हमें अपने अंदर के बच्चे को हमेशा बनाए रखना चाहिए ताकि हम अपने जीवन की छोटी – छोटी खुशियों का आनंद ले सकें।

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    1. धन्यवाद, राशी! अपने अंदर के बच्चे को जीवित रखिए और जीवन आनन्दमय बनाइए!

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