मन में यह मलाल क्यों,
चेहरे पे ये सवाल क्यों,
कहाँ मिलेंगे तुझे जवाब,
होता है हलकान क्यों?
जान ले तू यह आज,
यहाँ राज़ में हैं दफ़न राज़,
कहाँ परतों को तू हटाएगा,
इसी तिलस्मी जाल में उलझ जाएगा,
न खड़े कर इतने सवाल,
न बन जा खुद ही अपने जी का जंजाल,
डाल वक़्त के हाथों में हाथ,
बह जा बहते के दरिया के साथ,
ज़िंदगी को इक खूबसूरत मोड़ दे,
सब कुछ ख़ुदा पे छोड़ दे,
कभी वो हंसाएगा, कभी वो रुलाएगा,
पर याद रख, मंज़िल पे वही पहुँचाएगा,
निकल तू बाहर खुद को लेकर हर भरम से,
रख तू पूरा भरोसा उस ख़ुदा के करम पे,
आख़री दम तक उसे ही तू साथ पाएगा,
तेरी डूबती किश्ती को वही पार लगाएगा,
उस की सरपरस्ती में तू बढ़ जा आगे,
उसी के हवाले कर अपनी ज़िंदगी के धागे,
हर उलझी तार को वही सुलझाएगा,
उसी के जलाल से तेरा जहान रौशन हो पाएगा!
अरुण भगत
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अति उत्तम गुरु जी❤️❤️👌👌
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धन्यवाद, मेरे प्यारे शिष्य! ईश्वर की कृपा आप पर बनी रहे!
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लाजवाब ❤️❤️❤️
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शुक्रिया, साहिल! खुश रहिए!
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Bahot khoob
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बहुत बहुत शुक्रिया, प्रिया! खुश रहिए!
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