यही बताए जीवन दर्शन

आदमी हो हीरा, क्या जाति क्या धर्म,

कृष्ण को प्यारी मीरा, सब से ऊँचे कर्म,

सब से ऊँचे कर्म, अच्छाई हो परम धर्म,

सब से ऊँचा क़द उसका जो जाने पर का मर्म,

जो जाने पर का मर्म, पर की पीड़ा अपनी ही जाने,

सुख दुःख के ताने बाने को सब सम ही माने,

सब सम ही माने, माने सब प्रभ की माया,

आत्मा पर हो केंद्रित, क्षणभंगुर जाने हाड़ मांस की काया,

क्षणभंगुर जाने हाड़ मांस की काया, न दे उस पर स्वयं को वार,

यह जाने इस आसक्ति में निश्चित है उसकी हार,

निश्चित है उसकी हार यदि विकार नाग उस से रहे लिपटे,

निश्चित है उसका पतन अगर स्वार्थ सिद्धि में वह सिमटे,

अगर स्वार्थ सिद्धि में वह सिमटे और मन हो उसका वाचाल,

जीवन उसके लिए बन जाएगा जी का एक जंजाल,

बन जाएगा जी का एक जंजाल यदि वह ज्ञान चक्षु न खोले,

रहेगा वह विक्षिप्त और क्षुब्ध अगर उसकी अंतरात्मा न बोले!,

अंतरात्मा न बोले तो नहीं सम्भव कल्याण,

यही बताए जीवन दर्शन और यही जीवन विज्ञान!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

12 thoughts on “यही बताए जीवन दर्शन”

    1. धन्यवाद, ममता जी! मुझे आपकी प्रतिक्रिया उतनी ही भायी जितना आपको कविता भायी!

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  1. बहुत खूब प्रोफ़ेसर साहब! जीवन उसी का सफल है, जिसके कर्म ऊँचे हैं और जो सबके सुख दुख में शामिल होता है! हमारे जीवन का सही मार्गदर्शन तो हमारी अंतर आत्मा ही करती है।

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