धीरे धीरे

धीरे धीरे, रे मना, धीरे सब कुछ होए,

क्यों रहता है जल्दी में, क्यों आपा है खोए?

धीरे पढ़िए, धीरे गुनिये, धीरे मन में उतारिए,

धीरे धीरे हौले हौले अपने जीवन को संवारिए,

धीरे धीरे होती हैं खोजें, धीरे धीरे आविष्कार,

धीरे धीरे ही होते मानव निर्माण के सपने साकार,

धीरे धीरे ही पक कर मिश्री जैसा मीठा होता है फल,

धीरे धीरे ही सीधा होता रस्सी में पड़ गया जो बल,

धीरे धीरे होता विचार और होता है दिमाग़ रौशन,

धीरे धीरे जिज्ञासाएँ होती शांत और होता उनका भरण पोषण!

धीरे धीरे ऋतुएँ बदलें अपने सुंदर रंग,

धीरे धीरे ही जीवन दर्शाए अपने अनूठे ढंग,

धीरे धीरे ही होता है मानव का मोह भंग,

धीरे धीरे ही तो भाता है अपने प्रभु का संग!

धीरे धीरे चिंतन होता, धीरे आत्म-विकास,

धीरे धीरे आत्मा आनंदित होती, होता अलौकिक प्रकाश!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

16 thoughts on “धीरे धीरे

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता जी! प्रकृति से हमें यह सीखना चाहिए कि सब कुछ धीरे धीरे अपने समय से ही होता है!

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