आओ हिंदी दिवस मनाएँ

आओ हिंदी दिवस मनाएँ,

माँ बोली के गीत हैं गाएँ!

माँ बोली होती सबसे प्यारी,

लगती है वह सबसे न्यारी!

माँ बोली है मूल से जोड़े,

इससे क्योंकर नाता तोड़ें?

यह है हमारे दिलों की भाषा,

इससे जुड़ी हमारी हर आशा,

यह हमारी संस्कृति का दर्पण,

क्यों न करें इस पर स्वयं को अर्पण?

माँ से मीठा कौन है बोले,

माँ के प्रेम को कोई कैसे तोले?

माँ बोली से जुड़े जीवन तार,

है समधुर इसकी झंकार!

वही माँ बोली लगा रही गुहार,

क्यों न सुनते हम उसकी पुकार?

माँ से मुख है जो मोड़े,

आत्म स्तोत्र से नाता तोड़े!

आओ हम सब प्रण लें आज,

माँ बोली की रखेंगे लाज,

इसके सिर पर रखेंगे ताज,

पूर्ण होंगे हमरे सब काज!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

21 thoughts on “आओ हिंदी दिवस मनाएँ”

    1. आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ, छविल! हम सब हिंदी पर अपनी पकड़ और सुदृढ़ बनाएँ!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, नेहा जी! आओ हम सब इस दिवस और अपनी भाषा के महत्व को समझें!

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  1. बहुत सुंदर रचना,
    सच मे माँ बोली भाषा,
    सबसे प्यारी होती है👏👏👏
    🙏🙏🙏🙏

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    1. धन्यवाद, मीनाक्षी जी! आपने तो स्वयं हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में स्वरचित कविता का बहुत सुंदर पाठ किया कल! आप बधाई की पात्र हैं!

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  2. सच में हिंदी दिल से बोली जाती है और यह हृदय की भाषा होती हैं।🙏💐

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    1. अपनी भाषा तो फिर अपनी ही है, ममता जी, और हमारे प्रेमपूर्ण आदर की पात्र है!

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  3. अति सुंदर, प्रोफ़ेसर साहब। हिंदी भाषा की वर्ण माला तो बहुत वैज्ञानिक रूप से बनायी गयी है तथा मातृ भाशा में वार्तालाप का आनंद ही अलग है।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, भाई! अपनी भाषा और वह भी संस्कृत से उपजी हिंदी की तो बात ही निराली है!

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  4. वाह, प्रोफ़ेसर साहब। हिंदी भाषा की वर्ण माला तो बहुत वैज्ञानिक रूप से बनायी गयी है तथा मातृ भाशा में वार्तालाप का आनंद ही अलग है।

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