यही प्रकृति का चक्र, यही उसकी सरसता

रिमझिम बारिश की बूँदें,

आत्मसात् कर लो आँखें मूँदे!

आकाश के कलश से छलकता यह अमृत,

धरा के कण कण को कर दे है पुलकित!

झूमती ये हवाएँ, कोयल है गीत गाए,

नाचते हैं मोर, फसलें लहलहाएँ!

अम्बर में दौड़ते बादल कभी छट जाएँ, कभी गहरायें,

कभी यह बरसते, कभी हमें भरमाएँ,

बदलती इनकी छटाएँ हमें मुग्ध हैं कर जाएँ!

नदियों का जल उफान पे, सागर की लहरें छूती नभ को,

सावन भादो का जादू मोह लेता सब के मन को!

वाष्प बन जो उड़ जाए, सोम बन वही बरसता,

यही प्रकृति का चक्र, यही उसकी सरसता!

काल चक्र यूहीं घूमता, नए रूप यह दिखाए,

इसे कौन घुमाए, अंतर द्रष्टा ही समझ पाए!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

16 thoughts on “यही प्रकृति का चक्र, यही उसकी सरसता”

  1. क्या बात है सर। बड़े गहराई और भाव से इतना सुंदर प्रकृति चित्रण किया है आपने। सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!🙏🙏🙏💐💐💐

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता मैडम! भाव और गहराई दोनो ही जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं! इन्हीं से जीवन सत्य का बोध हो सकता है!

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    1. धन्यवाद, प्रिया जी! आपकी प्रतिक्रिया के लिए भी मैं यही कहूँगा, ” बहुत ख़ूब!”

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