रिमझिम बारिश की बूँदें,
आत्मसात् कर लो आँखें मूँदे!
आकाश के कलश से छलकता यह अमृत,
धरा के कण कण को कर दे है पुलकित!
झूमती ये हवाएँ, कोयल है गीत गाए,
नाचते हैं मोर, फसलें लहलहाएँ!
अम्बर में दौड़ते बादल कभी छट जाएँ, कभी गहरायें,
कभी यह बरसते, कभी हमें भरमाएँ,
बदलती इनकी छटाएँ हमें मुग्ध हैं कर जाएँ!
नदियों का जल उफान पे, सागर की लहरें छूती नभ को,
सावन भादो का जादू मोह लेता सब के मन को!
वाष्प बन जो उड़ जाए, सोम बन वही बरसता,
यही प्रकृति का चक्र, यही उसकी सरसता!
काल चक्र यूहीं घूमता, नए रूप यह दिखाए,
इसे कौन घुमाए, अंतर द्रष्टा ही समझ पाए!
अरुण भगत
क्या बात है सर। बड़े गहराई और भाव से इतना सुंदर प्रकृति चित्रण किया है आपने। सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!🙏🙏🙏💐💐💐
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बहुत बहुत धन्यवाद, ममता मैडम! भाव और गहराई दोनो ही जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं! इन्हीं से जीवन सत्य का बोध हो सकता है!
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Sir I am seriously speechless…your hindi poems are seriously incomparable…salute
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Thanks a lot, Priyanka Ji! Very happy to see that you like my Hindi compositions too in a big way! Stay blessed.
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Awesome lines sir😇😇😇well explained😌😌😌😌
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Thank you, Sapna! Well-explained is half done, as we might say! God bless you!
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Beautiful words!!!!
Fantastic poem 👏👌
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Thank you very much, Neha Ji, for finding beauty in my writing! It is your own inner beauty that is being thus reflected!
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Wow!Sir अति सुन्दर 👌👌👌
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धन्यवाद, आदसु, आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए!
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Sahi baat hai sorry..
Bhot khoob👌
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धन्यवाद, प्रिया जी! आपकी प्रतिक्रिया के लिए भी मैं यही कहूँगा, ” बहुत ख़ूब!”
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वाह! बहुत उम्दा सर👌👌
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धन्यवाद, श्वेता जी! अच्छा लगा कि आपको कविता उमदा लगी!
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मजा आ गया! बहुत ही सुन्दर प्रकॄति चित्रण !
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धन्यवाद! मुझे आपकी सुंदर प्रतिक्रिया को देख मज़ा आ गया! खुश रहिए!
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