अगर ग़रूर न करते
तो बेमौत न मरते,
न होती हमारे ज़मीर की ज़मीं बंजर,
न होता बेनूर और बेरौनक़ यह मंज़र!
न फ़िज़ा में घुलता यह जानलेवा ज़हर,
न बरपाते इक दूजे पे यूँ क़हर,
न बनते इक दूजे की बर्बादी की वजह,
न देते लम्हों में सदियों की सी सज़ा!
ग़र ग़रूर और ख़ुद्दारी में फ़र्क़ कर पाते
तो यूँ दुनिया से रुसवा हो कर न जाते,
फिर शायद इस जमीं पर अमन और चैन होता,
और मुहब्बत के अनमोल ख़ज़ाने को कोई यूँ बेवजह न खोता!
फिर शायद यह दुनिया ही जन्नत होती,
और हर रिश्ता होता इक नायाब मोती!,
फिर ज़र्रे ज़र्रे में ही दिखता खुदा का नूर,
और इन्सान होता न इन्सान से मीलों दूर!
अरुण भगत
Bohat khoob👌🏻👌🏻👏👏
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धन्यवाद, अंकिता जी! खुश रहिए, स्वस्थ रहिए!
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Behetrin 💞💞
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धन्यवाद, साहिल प्यारे! आपका बेहतरीन कहना आपकी बेहतरीन सोच दर्शाता है!
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Beautiful lines Sir!!!!!!
Just superb 👌
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Thanks a ton, Neha dear! I admire your consistent admiration! Stay blessed.
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Waah !
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क्या बात है, शिवम् जी! एक शब्द में ही सब कह दिया!
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Bahot sunder sir..👌
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धन्यवाद, प्रिया, लिखने वाले का मान बढ़ाने के लिए! खुश रहिए!
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Beautiful lines with a thought provoking msg…
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Thank you, Sonia Ji! If a writer is able to heighten your sensibility and provokes you to ponder over life, his or her job is done!
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Nice lines sir❤
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Very nice of you to say so, Sapna dear! God bless you!
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👏👏👏👏👏
Great poetry ❤️🥰😍
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Thank you very much, Archit darling! Kind of you to say so!
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Excellent sir🔥🔥🔥🔥
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Thank you very much, Chhavil! God bless you!
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बहुत ख़ूब, प्रोफेसर साहब। जहाँ एक ओर ग़रूर अशांति और तबाही के मंज़र की तरफ ले जाता है, वहां नम्रता आपकी ज़िन्दगी को सरल और शांतिमय बनाती है।
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हार्दिक अभिनंदन और धन्यवाद, जोगेश भाई! काश जो आप कह रहे हो वह हम समझ पाते!
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वाह जी वाह… “अगर गुरूर और खुद्दारी में फर्क समझ पाते”… बहुत खूब, भाई
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बहुत बहुत धन्यवाद, सनी भाई! अगर हम वाक़ई चीज़ों में फ़र्क़ समझ पाते तो क्या बात थी!
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