कितना अच्छा होता

कितना अच्छा होता

कि पैसा चाहे थोड़ा कम होता

लेकिन ज़िंदगी में होता जोश,

चीज़ों को लेकर न हो जाते बदहोश!

कितना अच्छा होता कि ऐशोआराम थोड़ा कम होता

पर हर किसी का ज़मीर न दिखाई देता सोता,

मन में न रह रह कर उठती हूक,

प्यार की न दिखती चारों ओर भूख!

कितना अच्छा होता की निजी वाहनों की जगह हमारे आस पास खड़े होते लोग,

तो मन को न लग जाते कई तरह के रोग,

अकेलेपन के न होते हम सब शिकार,

और आराम से होता जीवन का बेड़ा पार!

कितना अच्छा होता कि अपनों के साथ बिता पाते सकून के कुछ पल,

जैसे बिलकुल ठहर सा गया हो किसी झील का जल,

जैसे ऊँघती सी हो कोई शाम,

जिसका न लगा पाए कोई दाम!

कितना अच्छा होता कि दोस्तों की सजती महफ़िलें,

और प्यार और गर्मजोशी के यूँ ही चलते सिलसिले,

मीठे से होते रिश्ते जैसे सर्दी की मीठी धूप

और उजला सा, संवरा सा होता इस जीवन का रूप!

कितना अच्छा होता कि अहम् के न हम मारे होते

और ज़िंदगी के हसीन पलों को न यूँही बेकार में खोते,

सब को कर अपना एक खुली और प्यारी ज़िंदगी जीते

और न रह जाते यूँ ही बस रीते रीते!

कितना अच्छा होता—

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

22 thoughts on “कितना अच्छा होता”

  1. आज के आधुनिक युग में अकेलेपन को दूर करने के लिए पुराने दौर की दोस्तों और अपनों की महफिलों का कोई और विकल्प हो ही नही सकता 👏👏👏👏👏👏
    बेहतरीन कविता 👌👌👌👌👌Sir🙏🙏🙏

    Like

    1. धन्यवाद, मीनाक्षी जी! आपकी बेहतरीन सोच के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन!

      Like

    1. धन्यवाद, स्नेहलता जी! शायद ठोकर खा कर हम समझें पर बिना ठोकर खाए समझें तो कुछ बात बने!

      Like

    1. धन्यवाद, ममता जी! आपको कविता अच्छी लगी तो मुझे भी अच्छी अनुभूति हुई!

      Like

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free