सब कुछ है वो जाने

अल्लाह जाने, मौला जाने,

सब कुछ है वो जाने!

सब को अपनी दात वो देता,

किसी से कुछ वो न लेता,

कोई माने या न माने!

सब पर अपनी रहमत बरसाता,

सब को अपनी ज़ुबाँ में समझाता,

कोई जाने या न जाने!

पूरी कायनात में वो बसता,

ज़र्रे ज़र्रे में वो जँचता,

कोई माने या न माने!

सब ओर उसका नूर है फैला,

कभी न होता है वो मैला,

कोई जाने या न जाने !

बंजर को वो कर दे हरा,

मिटा देता वो हर ज़रा,

कोई माने या न माने!

अगर दिल को कर लें साफ़,

हम सब को वो करता माफ़,

कोई जाने या न जाने!

मुझ में रहता, तुझ में रहता,

ज़मीर के ज़रिए सब कुछ कहता,

कोई माने या न माने!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

25 thoughts on “सब कुछ है वो जाने”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, नरेंद्र जी! अच्छा लगा कि कविता आपको पसंद आयी!

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    1. धन्यवाद, विजय लक्ष्मी, और बहुत बहुत प्यार एक लेखक की ओर से अपनी बहुत अच्छी पाठिका को!

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    1. धन्यवाद, नेहा जी! आपका स्नेह हमेशा मिला है ईश्वर की कृपा से! खुश रहिए हमेशा!

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    1. धन्यवाद, रचना जी, आपके स्नेह और प्रोत्साहन के लिए! मैं आपका ऋणी हूँ!

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  1. बिल्कुल सही सर । भगवान तो हर चीज़ में बसे हुए हैं बस उन्हें देखने का तरीका सबका अलग – अलग है।

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    1. बिलकुल सही कहा आपने, राशी! ईश्वर सर्वत्र हैं, बात महसूस करने की है!

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  2. मुझ में तुझ में समाया है वही
    मुस्कानों में भी बयाँ है वही

    उत्तम वचन अरुण जी

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