दिल है कि मानता नहीं,
बाँवरा है, कुछ जानता नहीं!
कभी इधर दौड़े,कभी उधर भागे,
पूछो,”क्यों चैन नहीं तुझे, अभागे?”
क्यों चाहे यह हर व्यंजन खाना,
क्यों चाहे है सब कुछ पाना,
क्यों यह हँसता, क्यों यह रोता,
क्यों मौज की नींद नहीं यह सोता,
क्यों जब डर से यह बैठा जाता,
क्यों तब कुछ इसे नहीं है भाता?
क्यों यह सारी दुनिया घूमे,
क्यों यह मस्त पवन सा झूमे,
फिर कभी यह क्यों जाए मुरझा,
और कोई इसे न पाए समझा?
अबोध बालक सा हर खिलौना माँगे,
न दिलाएँ तो सूली पर टाँगे!
बोले यह,”चित भी मेरी, पट भी मेरी,
मुझे झेलना, क़िस्मत तेरी!”
मन का यही झमेला है, मन की यही रीत,
जिस ने मन पर क़ाबू पाया, है बस उसी की जीत!
अरुण भगत
Well said sir😇😇
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Thanks, Sapna dear, for your equally good response!
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बहुत ही सुन्दर, सर !
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धन्यवाद जी आपके प्रोत्साहन के लिए! खुश रहिए!
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Beautiful poem sir.
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धन्यवाद, विजयलक्ष्मी जी! ईश्वर की कृपा आप पर बनी रहे!
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Bahuut khub sir🙏
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धन्यवाद, रचना जी! खूबी आपकी है कि आप ‘ बहुत ख़ूब’ कह रही हैं!
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Such a sweet poem, Sir.
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धन्यवाद, स्नेहलता मैडम, आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए!
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Bhot hi sunder abhivyakti sir!!.
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका भी आपकी अभिव्यक्ति के लिए!
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👏बहुत अच्छा लिखा sir✌️
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धन्यवाद, रचना जी! आप जैसे अच्छे पाठक की लेखन को गति प्रदान करते हैं!
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वास्तव में जिसने मन पर काबू पाया, है बस उसी की जीत।
बहुत सुंदर कविता
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धन्यवाद, ममता जी! जीती रहिए!
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सच है
दिल तो बच्चा है जी❤️❤️
बहुत सुंदर कविता 👌👌
🙏🙏
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धन्यवाद, मीनाक्षी जी! खुश रहिए और इस बच्चे पे नज़र रखिए!😊😊😊
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Mind is playful…In the poem Know Then Thyself there has been shown a great agitation between mind and heart…Feelings can be controlled to some extent but it is very difficult to restrain mind…lovely poem
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Thank you, Ma’m! Taming the monkey mind is always going to remain a challenge. So be it. We should pick up the gauntlet, shouldn’t we?
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