बाँवरा है, कुछ जानता नहीं

दिल है कि मानता नहीं,

बाँवरा है, कुछ जानता नहीं!

कभी इधर दौड़े,कभी उधर भागे,

पूछो,”क्यों चैन नहीं तुझे, अभागे?”

क्यों चाहे यह हर व्यंजन खाना,

क्यों चाहे है सब कुछ पाना,

क्यों यह हँसता, क्यों यह रोता,

क्यों मौज की नींद नहीं यह सोता,

क्यों जब डर से यह बैठा जाता,

क्यों तब कुछ इसे नहीं है भाता?

क्यों यह सारी दुनिया घूमे,

क्यों यह मस्त पवन सा झूमे,

फिर कभी यह क्यों जाए मुरझा,

और कोई इसे न पाए समझा?

अबोध बालक सा हर खिलौना माँगे,

न दिलाएँ तो सूली पर टाँगे!

बोले यह,”चित भी मेरी, पट भी मेरी,

मुझे झेलना, क़िस्मत तेरी!”

मन का यही झमेला है, मन की यही रीत,

जिस ने मन पर क़ाबू पाया, है बस उसी की जीत!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

20 thoughts on “बाँवरा है, कुछ जानता नहीं”

    1. धन्यवाद, रचना जी! आप जैसे अच्छे पाठक की लेखन को गति प्रदान करते हैं!

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  1. वास्तव में जिसने मन पर काबू पाया, है बस उसी की जीत।
    बहुत सुंदर कविता

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  2. सच है
    दिल तो बच्चा है जी❤️❤️
    बहुत सुंदर कविता 👌👌
    🙏🙏

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  3. Mind is playful…In the poem Know Then Thyself there has been shown a great agitation between mind and heart…Feelings can be controlled to some extent but it is very difficult to restrain mind…lovely poem

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