यूँही समय का चक्का घूमे

आगे दौड़, पीछे चौड़ ,

कैसी लगी है जग में होड़?

अंधी दौड़ में सब सरपट भागे,

बिखर गए हैं सब धागे!

टूट गया सब ताना बाना,

किसी का मर्म न कोई है जाना!

किसी की पीड़ा कोई न जाने,

हर कोई अपना दर्द है माने!

गिरते हुए को कोई न उठाए,

हर कोई उल्टा पाठ पढ़ाए!

मुख से करते राधे-राधे

हर कोई अपना स्वार्थ है साधे!

हर कोई अपने लोभ से लिपटा,

हर कोई अपने आप में सिमटा!

मन की कोई मन न जाँचे,

तन की महिमा हर कोई बांचे!

सब जकड़ें है मोहपाश में,

सब फँसे हैं छद्म जाल में!

हर कोई अपने नशे में झूमे,

यूँही समय का चक्का घूमे!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

17 thoughts on “यूँही समय का चक्का घूमे

  1. बहुत सुंदर कविता लिखें है सर। 🙏🙏🙏

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  2. बिल्कुल सही सर । यह कविता जीवन की सच्चाई को दिखाती है । सब लोग अपने आप में ही लगे हुए हैं । हम यह नहीं देख पा रहे की दूसरे की क्या दशा है।

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    1. बिलकुल सही, राशी! मनुष्य ने अगर पर की पीड़ा नहीं जानी तो फिर मानव तो न हुआ!

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