ख़ूबसूरत रिश्तों को नज़र

उमदा और ख़ूबसूरत रिश्तों की बात ही कुछ और होती है! वे होते हैं सर्दी की पीली धूप में खिले ख़ुशनुमा फूलों की तरह, वे होते हैं ताज़ी मीठी हवाओं के लहराते झोंकों की तरह, वे चमकते हैं जाढ़े की नम ओस के मोतियों की तरह, वे होते हैं एक मासूम बच्चे की बेबाक़ खिखिलातीContinue reading “ख़ूबसूरत रिश्तों को नज़र”

बाँवरा है, कुछ जानता नहीं

दिल है कि मानता नहीं, बाँवरा है, कुछ जानता नहीं! कभी इधर दौड़े,कभी उधर भागे, पूछो,”क्यों चैन नहीं तुझे, अभागे?” क्यों चाहे यह हर व्यंजन खाना, क्यों चाहे है सब कुछ पाना, क्यों यह हँसता, क्यों यह रोता, क्यों मौज की नींद नहीं यह सोता, क्यों जब डर से यह बैठा जाता, क्यों तब कुछContinue reading “बाँवरा है, कुछ जानता नहीं”

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