दिल को दिल की राह होती है

दिल को दिल की राह होती है 

सब को प्यार की चाह होती है 

दिल ही दिल की भाषा जाने 

प्रेम से ऊपर वह कुछ न माने 

दिल न हो तो दुनिया सूनी 

जैसे विशाल ऊसर मरुभूमि 

दिल ही तो है जो रिश्ते सींचता 

जन को जन की ओर खींचता 

दिल की भाषा सुमधुर और प्यारी 

घृणा और कटुता पर पड़ती भारी 

दिल न होता तो प्रेम रस कौन पीता 

रह जाता तब मानव शुष्क और रीता 

दिल न हो तो जीना पड़ जाये भारी 

चाहे मिले दुनिया की दौलत सारी 

दिल से ही प्रभु प्रेम द्वार खुलता 

जीवन में ईश  कृपा रस घुलता! 

रचनाकार 

अरुण भगत 

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बांह पसार ऐसे जन को मिलिए

वे लोग अच्छे होते हैं 

जो मन से बच्चे होते हैं 

मन को यूँ भा जाते हैं 

क्योंकि वे सच्चे होते हैं 

इस कपटी दुनिया में 

जो रह पाते हैं अबोध 

वही जन ईश्वर को भाते 

उन्हें है जीवनामृत का बोध 

जो हैं सरल हृदय निष्पाप 

छूता उन्हें न कोई संताप 

जिस अनुकंपा को जग तरसे 

वह प्रभु कृपा है  उन पर बरसे

कमल भांति जो अछूते खिलते 

ऐसे प्रभु प्यारे हैं  दुर्लभ मिलते

बांह पसार ऐसे जन को मिलिए 

उनकी संगत में पुष्पित हो खिलिए! 

रचनाकार 

अरुण भगत

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When Feelings Run Dry…

When feelings run dry,

You live in a landscape barren

Where nothing grows or sprouts.

In the mad din of things material,

You just barely merely exist,

Trying to salvage your soul 

That has run out of its food.

Left in this spiritual wasteland

Is a strange benumbing discontent,

A restlessness that sears your being,

Nibbling at its core, an unyielding rat! 

When will the vital river come alive

To rejuvenate our core and make it thrive? 

When will the song bird come back, O, when?  

Arun Bhagat

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नए साल की हो नई रीत

एक साल और बीता 

कुछ खट्टा कुछ मीठा 

कुछ रह गया रीता 

कुछ ख्वाहिशें हुईं पूरी 

कुछ रह ही गईं अधूरी 

टूटे कुछ  सजीले सपने

पराए हो गए जो थे अपने 

कोई राह जाते पिछड़ गया 

 कोई जग छोड़  बिछड़ गया 

जहाँ कुछ  नए रिश्ते मिले 

पुरानों को खा गए गिले 

जंगों के रह-रह शोले भड़के

 परवान चढ़े  कितने लड़ के 

कितने नफ़रत की भेंट चढ़े 

उखड़े कितने जो मुर्दा थे गड़े 

हुक्मरानों ने फिर खेले खेल

तुम्हारी हमारी बन गई रेल 

बढ़ गई कितनी धक्का-पेल 

कैसा अजब हो रहा ये खेल 

धुएँ के बादल हो गए अति गहरे 

लग गए प्रदूषण के कड़े पहरे 

तकनीक जो सिर चढ़ है बोली

मानव ने तो मानवता ही  खो ली 

कहीं पैसा पानी सरीखे बरसा

तो कोई रोटी के लिए है तरसा 

गए साल की अजब थी चाल 

देखें क्या लाता है  नया साल 

नए साल की हो नई रीत 

जग में बढ़े सद्भाव और प्रीत 

नए गीत हों और नई उमंग

प्रेम सम्भाव की उठे तरंग 

 जीवन को मिले नई दिशा 

नई भोर हो, छट जाए निशा! 

अरुण भगत

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* क्योंकि अब नव वर्ष दस्तक दे रहा है , आप सब को आगामी वर्ष और आने वाले सभी वर्षों के लिए ढेरों शुभकामनाएँ! आप सब का जीवन प्रत्येक दृष्टिकोण से सुखद और मंगलमय हो! उच्च विचार, सुंदर भावनाएँ और सुकर्म आपके जीवन को सुशोभित करें! आप सब स्वस्थ रहें, आनंद में रहें, इस बहुमूल्य जीवन को सार्थक बनायें और हम सब  मिलकर ईश्वर की असीम कृपा से एक सुंदर संसार का निर्माण करें !

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मुझे गिला नहीं …

मुझे गिला नहीं कि तूँ बिछड़ गया 

टीस ये है तूँ मेरा कभी था ही नहीं

मैं जानता था की सच का रस्ता होगा दुश्वार 

मगर तूँ उस राह का मुसाफ़िर कभी था ही नहीं 

लगता  था मंज़िल-ए – मुक़्क़दस तेरे कदम चूमेगी 

मगर तूँ उस मंज़िल का तलबगार कभी  था ही नहीं

सोचता था चोटियों पे फहरायेगा तूँ अपना परचम  

मगर उन बुलंदियों का तूँ कभी हक़दार था ही नहीं 

उम्मीद थी तूँ बनेगा मेरा पुर ख़ुलूस हमसाया 

ये ख़बर न थी तेरा साया भी तेरे साथ नहीं 

-दुश्वार = मुश्किल 

-मंज़िल-ए-मुक़द्दस = पाक पवित्र मंज़िल 

-तलबगार= इच्छुक 

-परचम = झंडा 

-पुर ख़ुलूस= उदार, निश्छल 

अरुण भगत

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अंधे युग की टेढ़ी चाल

अंधे युग की अंधी दौड़ 

आगे दौड़,  पीछे चौड़ 

अंधे युग की अंधी बातें 

सहमे दिन ,काली रातें 

अंधे युग की टेढ़ी चाल 

रूठे सुर, बिगड़ी ताल

अंधे युग की अंधी भूख 

गई समझ की डाली सूख 

अंधे युग के विकृत बोल 

भरे घावों को देते खोल 

अंधे युग में झूठ की जीत

बन गई यह दुनिया की रीत 

अंधे युग का यह निर्मम सच 

विरला कोई पाया इससे बच! 

अरुण भगत

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कौन है वो ?

वो कौन है जो बन मेरा मुर्शिद

हर घड़ी मुझे राह दिखाता है 

पल-पल मेरा हौंसला बढ़ाता है 

 टेड़े रस्तों पे भी फ़ख़्र से चलाता है 

कौन है जो गहरी उदास शामों को 

जला उम्मीद की शमा रौशन बनाता है 

बैचैन बे-करार लम्हों में मुझे 

सकूँ और चैन की नींद सुलाता है 

कौन है जो उस मीठी नींद से जगा मुझे

खूबसूरत सहर से रू-ब-रू कराता है 

कौन है जो बेहतरीन रूहों से मिलाता है

इलाही इल्म  की अलख जगाता है 

दुश्वारिओं को दूर किए जाता है 

इक नूरी दुनिया की ओर लिए जाता है 

कौन है वो ? 

*मुर्शिद = guide

सहर= morning 

इलाही इल्म = divine knowledge

दुश्वारियां = difficulties 

नूरी दुनिया = a world of celestial light

अरुण भगत

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बाकी तो सब है इक झूठा फ़साना

क्या छिन गया तुम्हारा 

जो उदास हो 

क्या लाये थे साथ 

जो हताश हो 

खाली हाथ आए 

खाली हाथ जाना

फिर क्यों बेवजह  बुनते  हो

ख्वाहिशों का ताना बाना 

काहे की रंजिश 

काहे का वैर 

कौन है अपना 

कौन है ग़ैर 

कुछ देर के मुसाफ़िर

जाना है कहीं दूर

जहाँ सुरमई शामों में 

बसता है इक नूर

उस नूर से ही निकले 

उस नूर में समा जाना 

बाक़ी तो सब है 

इक झूठा फ़साना! 

अरुण भगत

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के ख़ाक है ये

“You are dust and to dust you shall return.”

के ख़ाक है ये 

ख़ाक में मिल जाएगी

फिर कोई और रूप धर

स्वाँग ये रचाएगी

फिर शुरू होगी दौड़-धूप

फिर वही धूप-छाँव

फिर वही कश्मकश

फिर वही शहर- गाँव 

यूहीं चलेंगे ये सिलसिले

कहाँ इसका सुराग मिले

कौन रह रह के नचा रहा

हमें दुनियावी पर्दे पे ला रहा

किसने ये बात जानी कि

कहाँ ख़त्म होगी ये कहानी

कहाँ जा थमेगा  ये खेल

कब होगा अपने रब से मेल?

अरुण भगत

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कुदरत तोड़ेगी हमारा ग़ुरूर

ये आसमानों में ठहरा हुआ ज़हरीला धुआँ

ये कन्हैया  की यमुना का झाग-झाग पानी

ये तेज़ी से पिघलते सिमटते बर्फ के तोदे 

बारिशों में क़हर बरपाती पहाड़ी नदियाँ

हमारी मिट्टी में घुल मिल  गया ये ज़हर

बे-दर्दी से सब कुछ झुलसाती गर्मियाँ

फटते और बेतहाशा बरसते ये बादल

दरदराते धंसते हुए हमारे दिलकश पहाड़ 

ज़मीं को निगलते हमारे बे-क़ाबू समंदर

बर्बाद होती फसलें, गुम होती बे-शुमार  नसलें

सब मिल कुछ बोल रहे हैं , हमारी पोल खोल रहे हैं

हमारे किए को तोल रहे हैं, हमारी जड़ें खोद रहे हैं

हो गया है अब ज़बर काफ़ी, नहीं मिलेगी कोई माफ़ी

किए की सज़ा मिलेगी ज़रूर, कुदरत तोड़ेगी हमारा ग़ुरूर

अर्श से फ़र्श पर ले आएगी,शायद तब हमें अक्ल आएगी! 

अरुण भगत

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