जिसे क़द्र नहीं अपनों की,
जिसे परवाह सिर्फ़ अपने सपनों की,
उसके सपने चाहे हों भी जाएँ साकार,
चाहे वह उन्हें दे भी पाए आकार,
उन सपनों में नहीं कोई रंग
जब तक न हो मोह भंग,
जब तक सब न लगें अपने
जब तक सबके सपने न बनें अपने!
जब तक प्रेम पथ का न हो विस्तार,
तब तक न हो कोई सार्थकता, न निस्तार!
जब तक हर कोई न लगे अपना,
तब तक समझो व्यर्थ प्रभु नाम जपना,
जब तक अहंकार से हों ग्रसित,
जब तक लोभ अभिमान करे व्यथित,
तब तक न मोक्ष न मुक्ति,
क्योंकि यह नहीं जीवन जीने की युक्ति!
जब तक हृदय का न हो विस्तार,
जिसमें समा जाए सारा संसार,
जब तक व्यापक न हो सोच
और वाणी की न हो लोच,
जब तक खुद को न दिखाएँ आइना,
तब तक क्या जीने का मायना?
जीवन वह जो पुष्प सरीखे महके,
चरित्र हो सबल और कदम न बहकें,
गहरी हों आस्थाएँ, अटल हो विश्वास,
तेजोमय हो आत्मा, सार्थक निश्वास!
अरुण भगत
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