वक्त गुज़र जाता है , इंसान गुज़र जाते हैं
बस हम यूँ ही ठगे-ठगे खड़े रह जाते हैं!
गुज़र जाते हैं दिन, गुज़र जाती हैं रातें
गुज़र जाते हैं वाक़यात, रह जाती हैं बातें !
गुज़र गए पोरस, गुज़र गए सिकंदर
मिट गए जहां से जिन्हें कहते थे धुरंधर !
गुज़र जाती हैं आँधियाँ, गुज़र जाते हैं वलवले
यूँ ही चलते रहते हैं ये ज़िंदगी के सिलसिले !
गुज़र जाते हैं मरहले, गुज़र जाते हैं सफ़र
यूँ ही देखने को मिलता है वक्त का असर!
सोचें तो वक्त नहीं गुज़रता, हम गुज़र जाते हैं
वक्त के खेल की गहराई कहाँ जान पाते हैं ?
1. वलवले= जोश, उत्तेजना
2. मरहले= पड़ाव
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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