जीवन नित नया,
जो बीत गया
सो बीत गया!
बीती बात बिसारिये
आज को संवारिये,
अतीत की गठरी उतारिये
स्वयं को यूँ ही न मारिये,
आज को जियो होकर मुक्त
यूँ ही न हो जाये वह लुप्त,
आज की संभावनाएं असीमित
न कर ख़ुद को तूँ सीमित,
स्वच्छंद भाव से जी हर पल
तभी सुनहरा होगा कल ,
देखो बुलाती नई आशाएँ
नई हवाएँ, नई दिशाएँ ,
नया है सूरज, नई है धरा
इस सच को ले समझ ज़रा,
नई बेला में हो जा नया
जाने दे जो कुछ भी गया,
जीवन नित नया,
जो बीत गया
सो बीत गया !
अरुण भगत
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