क्या बात हो ग़म सारे ख़्वार(तबाह) हो जाएँ
ख़ुशिओं का पकड़ें दामन, बेड़ा पार
हो जाए
क्या बात हो हम खुली किताब बन जाएँ
दिल में हो सकूँ, ज़िंदगी झूम के गाये
क्या बात हो ज़लज़ले भी हौंसला तोड़ न पाएँ
जहाँ भी जाएँ, सर उठा के बे-ख़ौफ़ ही जाएँ
क्या बात हो कि रूह की पेशानी पे ना हो कोई दाग़
ज़मीर को झुलसा ना सके ज़माने की कोई आग
क्या बात हो कि ज़िंदगी की नेमत को ना करें ज़ाया
गुनाहों से रहें दूर, पाकीज़गी बन जाये हमसाया
- ख़्वार= तबाह
- पेशानी = माथा
अरुण भगत
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