ज़िंदगी की कश्मकश

अजीब सी कश्मकश है ज़िंदगी की 

आसानी से आदम का दम भी नहीं निकलता 

बर्फ के तोदे अब पिघलने लगे हैं मुसलसल 

बस इक इंसान का दिल है जो नहीं पिघलता 

वो जो लगा है कायनात को समझने में 

उस शख़्स  से अपना ही घर नहीं सम्भलता

जो बात करता है  दुनिया से लड़ जाने की

  देख खतरा ख़ुद ही घर से नहीं निकलता 

कुछ ऐसी ही पहेलियाँ हैं इस  ज़िंदगी की 

जल्दी से जिनका कोई सिरा नहीं मिलता 

बर्फ का तोदा = glacier 

मुसलसल = continuously 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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