ज़िंदगी के नायाब तोहफ़े को यूं ना गवायें

ज़िंदगी के नायाब तोहफ़े को यूं ना गवायें 

चलो हंसें और किसी और को भी हंसायें 

जो गया है गिर उसे पकड़ बांह उठायें 

फिर जी उठेगा वो और देगा दुआयें  

जो मुफ़लिसी के मारे रोटी को है तरसता

क्यों हमारा प्यार उस पर नहीं है बरसता 

चलो पकड़ इक दूजे का हाथ आगे बढ़ जायें  

करें सबसे मोहब्बत नफ़रतों से निजात पायें

चलो मिल बढ़ जायें इक नई सहर की ओर 

जहां ना हो कोई अलगाव ना कोई ज़बर ज़ोर 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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