अनमोल लम्हे जो रह गए तेरे हाथ में

जो खो गया है वक़्त की गर्द में 

उसे न अब तलाश कर

फिर कहाँ जीत पाया है  कोई 

 ऐसी बाज़ी हार कर

जो गुम हो गया परछाईयों की भीड़ में

उसे कहाँ है खोजता

बना मुसाफ़िर किसी और जहां का

अब कहाँ वो बोलता

जो हो गया रुख़्सत  कह अलविदा

मीठी याद बन रह गया

समंदर की मौज उसे है ले गई

न जाने कहाँ वो बह गया

यूँ ही ले जाएगा  सबको ये ज़िंदगी का रेला

न हो तू ग़म- ज़दा 

अनमोल  लम्हे रह गए जो तेरे हाथ में 

सुन ले उनकी बस सदा

रचयिता

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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