सोचता हूँ होंगी क़बूल इक दिन मेरी दुआएँ

मैं मोहब्बतों के दिलकश गीत गाता हूँ

हर किसी को ख़ुद  के क़रीब पाता हूँ

हर कोई शख़्स मुझे है लगता अपना

जैसे शीरे में भीगा कोई मीठा सपना

हर किसी की रूह को देता हूँ आवाज़

इसी से करता हूँ  रिश्तों का आग़ाज़

नहीं लगता है  मुझे कोई भी ख़ुद से जुदा

हर किसी में दिखता है मुझे वही एक ख़ुदा

बेमानी लगती हैं मुझे अलगाव की सारी बातें

जैसे दिन से जुदा होने की कोशिश में हों रातें

सोचता  हूँ होंगी क़बूल इक दिन मेरी दुआएँ

ख़ुदा का नूर बरसेगा लेंगी रुख़सती  सब जफ़ाएं 

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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