तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो

चाहे मार्ग में फूल खिले हों

या फिर मानो शूल बिछे हों,

चाहे आकाश में बिजली कौंधे

या फिर कोई सपनों को रौंदे,

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो!

जीवन नहीं रुकने का नाम,

हताशा का नहीं कोई काम,

बनो नदी की अविरल धार,

होगा अवश्यमेव बेड़ा पार,

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो!

अजब ही है जीवन का खेल,

जहां देखो वहाँ धक्का-पेल,

भीड़ चीर तुम बढ़ जाओ आगे,

रुकना वीर को कभी न साजे,

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो!

जीवन के हों चाहे कितने रंग,

असंख्य संभावनाएँ तुमरे संग,

फिर तुम क्यों हो साहस खोते,

क्यों भय सागर में खाते गोते?

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो!

बढ़ोगे जब तुम लक्ष्य बांध,

उत्साह की न होगी साँझ,

तुम पर होगा प्रभु का हाथ,

प्रकृति हो लेगी तुमरे साथ,

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

2 thoughts on “तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो

Leave a reply to Arun Bhagat Cancel reply

Design a site like this with WordPress.com
Get started