जीवन एक छोटा सा अंतराल ही तो है
शून्य और शून्य के बीच, शाश्वत मौन और मौन के बीच,
फिर इसको लेकर इतना कोहराम क्यों,
कोलाहल क्यों ?
कहाँ ले जाएगी यह सरपट दौड़, क्या पा लेंगे,
क्या पास रह जाएगा,
क्यों चिंता हैं खोने की जब अपना कुछ है ही नहीं ?
जब कुछ साथ लाए ही नहीं और न ही ले जाएँगे
तो फिर क्या पाना और क्या खोना, किस बात का विषाद और विवाद?
किसी से क्या जीतना है और क्या है हारना?
जब हार-जीत का कुछ प्रयोजन ही नहीं,
तो हारने पर अपमान कैसा और जीतने पर उन्माद क्यों?
जो कुछ भी दिखता है जब नश्वर है
तो उससे लगाव क्यों, उसके प्रति आसक्ति कैसी?
जीवन एक स्वप्न मात्र ही तो है, अस्थाई और क्षणभंगुर,
तो उसे ले इतने विह्वल क्यों, उत्तेजित क्यों?
यही प्रश्न हमें ले जाएँगे विरक्ति के मार्ग पर, अंतर्मन के मौन के गर्भ में,
और वहीं से आरंभ होगी हमारी शाश्वत मौन की दिशा में वापसी यात्रा!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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अंकित जी, रचना को सराहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! खुश रहिए!
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