ख़ाली हाथ आए,
ख़ाली हाथ जाना,
भाग मृगतृष्णाओं के पीछे
कुछ नहीं है पाना,
अटल सत्य से हम
सब दूर भागते,
रहते सोए,
कभी न जागते,
भ्रम में जीते,
भ्रम में मरते,
आलिंगन सत्य का
कभी न करते,
यूहीं दौड़ती
विकारों की गाड़ी,
यूहीं उलझाती
अज्ञानता की बाढ़ी,
यूहीं मद
सिर चढ़ कर बोलता,
पट ज्ञान के
कभी न खोलता,
यूहीं जीवन का
चलता मेला,
यूहीं खेलती
माया खेला,
क्यों नहीं हम
स्वयं को संवारते,
क्यों मानव जीवन की
दुर्लभता बिसारते,
क्यों?
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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Thanks for your kind appreciation, Ankit dear! Stay blessed.
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