मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी स्याह समुंदर से नूर निकलेगा
-अमीर कज़लबाश
अमीर कज़लबाश के इस उमदा कलाम से उपजी मेरी रचना
काले मायूस बादल का चीर सीना
मेरे हौंसलों का सूरज ज़रूर निकलेगा
चाहे लाख कोशिश कर ले ज़हालत
ज़ेहानत का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा
बीच बैचेन रूहों की इस कश्मकश के
सकूँ का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा
लाख मौत के मुँह में धकेले बदहाली
जीने का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा
ग़ुरबत के मारे इस अवाम के सदके
खुशहाली का रस्ता ज़रूर निकलेगा
मज़लूमों की जानिब ग़र बढ़ाओगे हाथ
दुआओं का दरिया ज़रूर निकलेगा
देखेंगे ग़र इंसाफ़ अमन-ओ-चैन का ख़्वाब
उसकी ताबीर का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा
अरुण भगत
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