बुन लिए नफ़रतों के जटिल जाल,
क्या कर लिया हमने अपना हाल,
भगवान को बाँट लिया कई हिस्सों में,
क़ैद कर लिया उसे अपने-अपने क़िस्सों में,
घृणा-द्वेष और वैमनस्य का किया ऐसा तांडव,
त्रस्त हुए जिससे न जाने कितने पांडव,
झुकने को मान लिया सबने बहुत सस्ता,
चुन लिया लोभ, मोह, अहंकार का रस्ता,
हमने प्रेम पथ विस्तार किया नहीं,
प्रभु के प्रति प्रगट आभार किया नहीं,
सुंदर मानवीय संभावनाओं को जिया नहीं,
विष का प्याला चुन लिया, आनंद सोम पिया नहीं,
युद्ध का बिगुल बजा, मानवता कह उठी, ” त्राहिमाम”,
कण-कण में बसे ईश्वर तत्व का भी नहीं किया सम्मान,
विषमताओं के इस गरल को नियति अपनी बना लिया,
क्या बन सकते थे हम, ख़ुद को क्या बना लिया?
अरुण भगत
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