ए ख़ुदा, रहम कर

ग़ुरूर के चलते सजदे में सर झुकाना भूल जाता हूँ

ख़ुद को तेरी पाक मोहब्बत के काबिल बनाना भूल जाता हूँ

भूल जाता हूँ तेरी रहमतों का शुकर करना

भूल जाता हूँ नहीं चाहिए मुझे अपनी सलाहियतों का दम भरना

भूल जाता हूँ कि मैं तो तेरे कदमों की ख़ाक हूँ

वक़्त के कदमों में यूँही बिछी राख हूँ

भूल जाता हूँ कि तू मेरा परवरदिगार है

कि मेरा रेशा-रेशा तेरा क़र्ज़दार है

शिकायत करता हूँ कि तू मुझे दिखता नहीं

मेरा इक शानदार मुस्तक़बिल लिखता नहीं

जानता हूँ कि नापाक मेरा दिल और झूठी मेरी शिकायत

मैंने भी कहाँ निभायी है खुदाई की रिवायत

ए ख़ुदा, मेरी बेशुमार ख़ताओं पे न ग़ौर कर

पाकीज़गी दे कि तेरा हाथ थाम सकूँ दौड़ कर

रहम कर और मुझे अपनी रहमतों से नवाज़

ताकि मेरी ज़िंदगी में भी हो इक इलाही सहर का आग़ाज़

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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