इंसानियत को ग़र दिया गंवा

इंसानी क़दरों का पतन

न सह सकता कोई वतन

इन क़दरों को जो खो दिया

मानो विनाश का बीज बो दिया

भूल गए सही ग़लत का फ़रक

तो समझो हो गए हम गरक

बर्बादियों के रस्ते खुल जाएँगे

फिर कहाँ चैन हम पाएँगे

इंसानियत को ग़र दिया गंवा

सारी तरक़्क़ी हो जाएगी हवा

जब ग़ैरत हाथ से जाएगी

तो शर्मसारी की हाथ आएगी

समझ लें इस बात को

न हाथ सुझाई देगा हाथ को

ग़र रोशनी के सब रस्ते कर दिए बंद

और ज़मीर बेच कमा लिए सिक्के चंद

ये दौलत किस काम आएगी

ग़र अस्मत ही विदा हो जाएगी

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

2 thoughts on “इंसानियत को ग़र दिया गंवा

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