हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर

ज़मीन धँस रही है,

इमारतें ढह रही हैं,

बारिशें क़हर ढा रही हैं,

नदियाँ उफान पे हैं,

हर चीज़ उनमें बह रही है,

पहाड़ हिल गए हैं,

मानो ये सब मिल गये हैं,

जंगलों की भीषण आग

छेड़ रही है डरावने राग,

ये धंसते पहाड़,

यह मिट्टी में मिलती इमारतें

और उनमें दब गई चीखें,

यह उफनती नदियाँ,

ये जंगलों की बेक़ाबू आग,

ये सब कर रहे हैं क्या बयाँ,

क्या हमने दिया है सब गवाँ,

क्योंकर किसी पर दोष मढ़ें,

कर्म हमारे हैं सामने आ खड़े,

यह तरक़्क़ी की अंधी दौड़,

आगे दौड़ और पीछे चौड़,

ये लालच का सैलाब,

ये हमारी बदसलूकी बदगुमानी,

न जाने हमें कहाँ ले आयी है,

ये बात है हमारी आपसी,

क्या हो पाएगी यहाँ से कोई वापसी,

शायद ही फिर चैन की बंसी बजा पाएँ,

शायद ही दुनिया के गुलशन को फिर सजा पाएँ,

हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर,

शायद ही वापसी का रास्ता रौशन कर पाए कोई नूर

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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