डर-डरके क्यों जीता है
ज़हर ख़ौफ़ का क्यों पीता है
तय है इक दिन तो मरना
फिर घड़ा पाप का क्यों भरना
ज़िंदगी तो है इक सपना
यहाँ नहीं है कोई अपना
फिर नेह क्यों लगाता है
ख्याली पुलाव पकाता है
क्यों फँसता किसी फंदे में
क्या रखा गोरखधंधे में
कुछ देर का ही यहाँ बसेरा
शायद न देखें कल का सवेरा
फिर क्यों तिल-तिल मरता है
दमड़ी-दमड़ी के लिए लड़ता है
गौर तो फ़रमा तू ज़रा
सब यहीं रह जाएगा धरा
चिड़िया फुर्र से उड़ जाएगी
ख़ाक यहाँ पे रह रह जाएगी
ख़ुद को ख़ाकसार ही जान
सब कुछ यहाँ भरम ही मान
अपनी बंद आँखों को खोल
सिर्फ़ हों तेरे सच्चे बोल
नेकी को अपना साथी बना
अपनी हिरस को करदे फ़ना
अपने को अदना ही जान
इलाही रहमत को सब कुछ मान
ताकि इस दुनिया में सकूँ पाये
और जब जाए तो चैन से जाए!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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True sir ji, 🙏🙏🌹🌹
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Thank you, dear! God bless you!
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