माँ तो आख़िर माँ है

माँ तो आख़िर माँ है,

अपने बच्चों में उसकी जाँ है,

बच्चे होते टुकड़े माँ के जिगर के,

वो है बसती उनकी नस-नस में,

माँ है तो सारा जहां है,

जहां माँ, जन्नत वहाँ है,

माँ ने है बच्चों को ज़ाया,

उनके लिए है वो घना साया,

राहत दे माँ की पुकार,

जैसे गर्मी में बारिश की फुहार,

उसकी ममता का नहीं कोई सानी,

छोटी लगे उसे अपनी हर क़ुर्बानी,

माँ तो बेशक है ख़ुदा का अक्स,

गुस्ताखियाँ बच्चों की देती सब बख्श,

माँ दुनिया की दौलत सबसे नायाब,

माँ की ख़िदमत सबसे बड़ा सवाब!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

2 thoughts on “माँ तो आख़िर माँ है

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