क्या आदमी था वो

क्या आदमी था वो,

सच के लिए लड़ मर सकता था,

सौ झूठों पे भारी पड़ सकता था,

क्या आदमी था वो,

कितने उसकी साफ़गोई का दम भरते थे,

उसकी पाकीज़गी पे मरते थे,

क्या आदमी था वो,

सारी कायनात से प्यार करता था,

ज़ुल्मो-जब्र के ख़िलाफ़ लड़ता था,

क्या आदमी था वो,

अपनी हर बुराई पे उसने वार किया,

ख़ुद से खुदाई तक का फ़ासला पार किया,

क्या आदमी था वो,

हर किसी को माना अपनी रूह का हिस्सा,

और यूँ रौशन किया इंसानियत का क़िस्सा,

क्या आदमी था वो,

जंग-ए -ज़िंदगी में हौंसले की ज़िंदा मिसाल था,

किरदार ओर जाँबाज़ी का उसके ज़हन में क्या विसाल था,

क्या आदमी था वो,

ज़िंदगी जीने का सलीका हमें सिखा गया,

चलने के लिए मुक़द्दस राहें हमें दिखा गया,

क्या आदमी था वो!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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