महक उठते उनसे वन-उपवन

जो स्वयं से नहीं हारे,

उन्हीं के वारे-न्यारे,

वही हैं ईश्वर को प्यारे,

जिनके पास संतोष का धन,

नियंत्रण में हैं जिनके मन,

वही तो हैं अमूल्य जन,

तेजोमय जिनका ललाट,

मस्तक के खुले जिनके कपाट,

मार्ग होगा उन्हीं का सपाट,

साहस से जो आगे बढ़ते,

वीर बन परिस्थितियों से लड़ते,

झंडे उन्हीं के हैं गढ़ते,

प्रेम रस को जो पीते,

ह्रदय उनके न होते रीते,

सही अर्थों में वही हैं जीते,

किसी बाधा से जो न डरते,

जीवन में सुंदर रंग वे भरते,

पर- मार्ग प्रशस्त वे करते,

न हों केवल उजले तन,

अपितु निर्मल जिनके मन,

महक उठते उनसे वन-उपवन!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

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