जीने की तमन्ना है तो खुल के जी

जीने की तमन्ना है तो खुल के जी,

घुट-घुट कर जीने के लिए लोग हैं ना,

मरना है तो इक बार शान से मर,

रोज़ तिल-तिल मरने वाले लोग हैं ना,

बनाना है तो सच को अपना हमसाया बना,

झूठ का निवाला परोसने वाले लोग हैं ना,

इबादत करनी है तो उस परवरदीगार की कर,

इंसान को ख़ुदा बताने वाले अदना लोग हैं ना,

बनाना है तो नेकनीयती को अपनी पहचान बना,

अपनी बदनीयती का परचम फहराने वाले लोग हैं ना,

गिर-गिर कर उठ जाने का जज़्बा हो तेरे अंदर,

इक बार ही गिरने पर ढह जाने वाले लोग हैं ना,

अपने अक्स को फ़ख़्र से देख पाने की कुव्वत कर पैदा,

ख़ुद से नज़र मिलने पर शर्मसार होने वाले लोग हैं ना,

अपनी मोहब्बत को बना दुनिया के ज़ख्मों का मरहम,

नफ़रतों की आग में सब कुछ झोंकने के लिए लोग हैं ना,

अपने क़द को इतना बढ़ा कि कायनात भी करे रश्क,

अपने बौनेपन का मुज़ाहरा करने वाले लोग हैं ना!

* Inspired by a very fine piece of Urdu poetry that I happened to listen to the other day.

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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