अनंत का है नाद

तुझ में, मुझ में,

रहता है वो,

निर्लेप है वो

न उसे कोई मोह,

योगी का योग,

भोगी का भोग,

कर्ता का कर्म,

मातृ का मर्म,

साधक की साधना,

भक्त की आराधना,

ज्ञानी का ज्ञान,

ऋषि का निर्वाण,

सर्वत्र वह बसता,

सब के दुःख हरता,

ज्ञानी का वह वाद,

अनंत का है नाद,

उस नाद को सुने कौन?

स्वयं को जो जाने गौण!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

8 thoughts on “अनंत का है नाद”

  1. अति सुंदर संदेश! अंतर्मन की गहराईयों में जा कर ही अनंत नाद को सुना जा सकता है!

    Like

    1. और अपने आप को गौण और नगण्य मानकर! आपकी सुंदर अनुभूतिशील प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, भाई!

      Like

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free