अंतर्मन की जो गिरह न खोले

जो न करता अध्ययन चिंतन,

जो न करता मन का मंथन,

सत्य-असत्य वह देख न पाए,

विषय-विकार उसे भरमायें,

अंतर्मन की जो गिरह न खोले,

अहंकार उसका सिर चढ़ कर बोले,

सुपथ से वह होता भ्रमित,

वासनाओं से वह रहता ग्रसित,

स्व-मोह का फंदा उसे जकड़े,

भीतर के असुर रहें उसे पकड़े,

अमोलक जीवन वह व्यर्थ गवाँए,

कौन उसे क्या-क्या समझाए,

मूढ़-मति की होती यही गति,

केवल प्रभु दे सकते उसे सुमति,

प्रभु कृपा है जहां बरसे,

तहाँ जड़मती होत सुजान,

प्रभु अनुकंपा माँगिये मन से,

सो कह गये संत- विद्वान!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

12 thoughts on “अंतर्मन की जो गिरह न खोले”

  1. अंतर्मन के द्वंद के परिणाम बयान करती बेहद उम्दा कविता👌👌👌💐💐

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    1. धन्यवाद, मीनाक्षी जी! आपको कविता अच्छी लगी, यह मेरे लिये प्रेरणादायी बात है!

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    1. धन्यवाद, ममता मैडम! पाठक को कविता अच्छी लगी तो लेखक का लिखना सफल हो गया!

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  2. अति सुंदर! चिंतन/आत्मचिंतन से ही जीवन का अर्थ प्राप्त होता है तथा मार्ग दर्शन होता है!

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    1. धन्यवाद, भाई! इसीलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए आत्मचिंतन आवश्यक है, उसी से सत्य का मार्ग प्रकाशित होता है।

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