जो न करता अध्ययन चिंतन,
जो न करता मन का मंथन,
सत्य-असत्य वह देख न पाए,
विषय-विकार उसे भरमायें,
अंतर्मन की जो गिरह न खोले,
अहंकार उसका सिर चढ़ कर बोले,
सुपथ से वह होता भ्रमित,
वासनाओं से वह रहता ग्रसित,
स्व-मोह का फंदा उसे जकड़े,
भीतर के असुर रहें उसे पकड़े,
अमोलक जीवन वह व्यर्थ गवाँए,
कौन उसे क्या-क्या समझाए,
मूढ़-मति की होती यही गति,
केवल प्रभु दे सकते उसे सुमति,
प्रभु कृपा है जहां बरसे,
तहाँ जड़मती होत सुजान,
प्रभु अनुकंपा माँगिये मन से,
सो कह गये संत- विद्वान!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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Awsm lines❤️
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Thank you very much, dear! God bless you!
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Well said💯❤
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Thank you very much, Sapna! Good of to see that you enjoyed reading the poem!
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अंतर्मन के द्वंद के परिणाम बयान करती बेहद उम्दा कविता👌👌👌💐💐
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धन्यवाद, मीनाक्षी जी! आपको कविता अच्छी लगी, यह मेरे लिये प्रेरणादायी बात है!
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बहुत अच्छी कविता लगी।
धन्यवाद सर। 🙏🙏👌
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धन्यवाद, ममता मैडम! पाठक को कविता अच्छी लगी तो लेखक का लिखना सफल हो गया!
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Beautiful poem on the need to enlighten our soul and give some meaning to this gift of life!👏👏👍👌
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Thank you very much, Manjula Ma’m! Since we have the potential, we all owe it to ourselves to move towards enlightenment. God bless everyone!
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अति सुंदर! चिंतन/आत्मचिंतन से ही जीवन का अर्थ प्राप्त होता है तथा मार्ग दर्शन होता है!
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धन्यवाद, भाई! इसीलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए आत्मचिंतन आवश्यक है, उसी से सत्य का मार्ग प्रकाशित होता है।
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