कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर

यह ज़िंदगी का मेला,

है क़िस्मत का खेला,

या समय का है रेला

जिसमें सब कुछ बह जाता,

कुछ समझ नहीं आता,

कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर,

यह ले जाए हमें किस ओर,

कभी लगे बहुत कुछ है अपना,

कभी सोचें, सब है सपना,

कभी लगाएँ इसको गुहार,

कभी लगे जैसे रही हो दुलार,

पल में तोला, पल में माशा,

कौन है समझे इसकी भाषा,

कभी देती यह पहाड़ से दुःख ,

कभी झोली में सारे डाले सुख,

क्या न्याय, क्या अन्याय,

कौन जाने इसका अभिप्राय,

कभी रुदन, कभी सुंदर गीत,

कौन है जाने इसकी रीत,

विस्तार व्यापक, रहस्य है गहरा,

इसके सामने कौन है ठहरा,

निहारते इसके रूप और रंग,

हम बहते जाएँ इसके संग,

इससे अपना नाता जोड़ें,

कहाँ ले जाए, इसपे छोड़ें!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

10 thoughts on “कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर”

  1. बहुत खूब, प्रोफेसर साहेब! ज़िंदगी एक पहेली है! इसके अनुभव कभी खट्टे कभी मीठे, कभी कटु कभी मधुर। इसे जीवन को जीने का सही अंदाज़ वो है, जिसमे बिना अधिक विश्लेषण किये, ज़िंदगी को खुशी से अपना ले और हर खूबसूरत पल का आनंद लें!

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    1. धन्यवाद। जोगेश भाई! बिना अधिक विश्लेषण किए जीवन-प्रवाह के साथ बहना आना चाहिए, बिलकुल सही कहा आपने!

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  2. जिंदगी हमें कहा ले जाती है इसका फैसला बस ईश्वर ही कर सकते हैं। हम तो बस उसी रास्ते पे चल सकते जो हमें वो दिखाते हैं। कभी जीवन में खुशियां आती हैं तो कभी दुख और हमें चौका दिया करते हैं।

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    1. बिलकुल, राशी! जीवन एक बहती नदी की तरह है, हम उसके साथ बहना सीखें और बाक़ी सब परमात्मा पे छोड़ दें, यही सबसे उत्तम मार्ग है!

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