खुद से मुँह कौन मोड़ सका है?

खुद से दूर भाग कर कहाँ जाएँगे,

खुद से दूर जा कर क्या पाएँगे,

खुद से दूर भाग कर जा सकते कहाँ,

जहां भी जा छुपेंगे, खुद को पाएँगे वहाँ,

खुद से मुँह कौन मोड़ सका है,

खुद से नाता कौन तोड़ सका है,

खुद से अगर होंगे ख़फ़ा,

तो किसी से न कर पाएँगे वफ़ा,

खुद से अगर होंगे बेज़ार,

तो हर मंज़र पर पाएँगे खुद को लाचार,

ज़रूरी है खुद से हाथ मिलाना,

ग़र चाहते है हम सकूँ पाना,

खुद से रिश्ते में ग़र होगा चैन,

तो ही ख़ुशगवार होंगे दिन और रैन,

खुद की तरफ़ बढ़ाएँगे ग़र दोस्ती का हाथ,

तो सारे जहां का मिल जाएगा साथ,

खुद को यूँ सँवारिये कि खुद पे कर सकें फ़ख़्र,

फिर बेहतर लगेगी ज़मीं और उम्दा लगेगा अब्र ,

खुद से ही शुरू होता है ख़ुदा तक का सफ़र,

खुद से होंगे मुतमइन तो ज़िंदगी होगी बा-असर!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

15 thoughts on “खुद से मुँह कौन मोड़ सका है?”

    1. धन्यवाद, मंजुला मैडम! हर चीज़ की शुरुआत खुदसे ही होती है, खुद से ही बढ़ते हैं खुदाई की ओर!

      Like

  1. बहुत उम्दा लिखा है सर 👏। हम खुद को जानेंगे तभी दूसरों को जान पाएंगे।

    Like

    1. बिलकुल सही, राशी! Alexander Pope also says,” Know then thyself, presume not God to scan,/ The proper study of mankind is man. आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

      Like

  2. “खुद से शुरू होता है खुदा का सफर”!
    क्या गजब कविता लिखे हैं सर बहुत सुंदर।

    Like

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free