रुकने का यहाँ क्या काम?

मुश्किल है अलविदा कहना,

मुश्किल है जुदाई का दुःख सहना,

पर ज़िंदगी तो है चलने का नाम,

रुकने का यहाँ क्या काम?

चाहे हमें एक दूसरे पर कितना भी प्यार क्यों न हो आता,

वक़्त का बहाव हम सब को है बहा ले जाता,

ले जाता हमें नयीं मंज़िलों की ओर,

करिए इस बात पर ज़रा गौर,

समय की नाव पर सवार,

न जाने कहाँ जा उतरेंगे पार,

पीछे छोड़ी जो रिक्तता, वह भी भर जाएगी,

नियति चुप-चाप अपना काम कर जाएगी,

फिर क्यों करें रोकने की कोशिश, क्यों रोएँ और रुलाएँ,

क्यों न प्रियजनों को दें शुभ आशीष और मिल उन संग उत्सव मनाएँ,

क्यों न उन्हें ख़ुशी से करें विदा, लेकर उनकी बलाएँ?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

7 thoughts on “रुकने का यहाँ क्या काम?”

    1. कविता के भाव को आत्मसात् करने और सराहने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, मीनाक्षी मैडम! खुश रहिए!

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  1. समय की अविरल धारा तथा ‘cycle of Nature’ पर सुंदर कविता।👍🏼
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति।👌🏻👏🏼👏🏼
    लिखते रहें , सर 🙏🏻

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    1. कविता और उसके भाव की सराहना के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद, मंजुला मैडम! लिखते रहने के लिए प्रेरित करने के लिए धन्यवाद! जब तक जीवन है , अवश्य लिखता रहूँगा क्योंकि लिखना मुझे अच्छा लगता है!😊

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