तो कुछ बात बने

दिल से दिल मिलें,

रूह के गुल खिलें,

तो कुछ बात बने!

हाथों में हों हाथ,

सब मिलकर बढ़ें साथ,

तो कुछ बात बने!

सब को गले लगाएँ,

सब की लें बलाएँ,

तो कुछ बात बने!

पर ज़िंदगी नहीं देती सदा सुख,

हवाएँ मोड़ लेती हैं अपना रुख़,

चाहे आग बरसाए अब्र,

फिर भी न खोएँ सब्र,

तो कुछ बात बने!

चाहे दामन हो चाक,

फिर भी सोच रहे पाक,

इतर की मानिंद फ़िज़ा में घुल जाएँ,

सब की लें दुआएँ,

तो कुछ बात बने!

चाहे न जाने कोई हमारा मर्म,

ज़िंदगी दे चाहे कितने ज़ख़्म,

चुपचाप उन्हें सिए जाएँ,

जज़्ब का जाम पिए जाएँ,

तो कुछ बात बने!

चाहे न हो कुछ क़सूर,

ज़िंदगी बन जाए नासूर,

तब भी हौंसला बना रहे ज़रूर,

ढह जाना न हो क़तई मंज़ूर,

तो कुछ बात बने!

चाहे दुशवार हो रास्ता,

सब रोकें, दे मुहब्बतों का वास्ता,

फिर भी ख़ौफ़ न खाएँ,

मुसलसल आगे बढ़ते जाएँ,

तो कुछ बात बने!

चाहे दिल हो तार-तार,

फिर भी हर लम्हा बनाएँ यादगार,

बेबाक़ हों और ऐसे बे-फ़िक्र,

कि हर दौर में हो ज़िक्र,

तो कुछ बात बने!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

12 thoughts on “तो कुछ बात बने

  1. अति सुंदर! परेरणा दायक कविता, जीवन के हर संघर्ष मे आगे बढने की परेरणा!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, भाई! जीवन अच्छे से जीने के लिए प्रेरणा आवश्यक है। जब मैं ऐसी कविता लिखता हूँ, तो स्वयं भी प्रेरित होता हूँ!

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  2. ये सब संभव हो जाये तो,
    बहुत अच्छी बात बने👌👌👌👌

    सुंदर कविता Sir👌👌🙏🙏

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  3. “दिल से दिल मिले, रूह के गुल खिले।”
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति सर 💐🙏

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