साँसों का है खेल सारा,
कुछ पल का है मेल सारा,
कब समय के गर्त में जाएँ खो,
कब बुझ जाए जलती लौ,
कब काल का ग्रास बन जाएँ,
कौन यह जाने , कौन बताए,
कैसी है यह प्रभु की माया,
जीवन है पल भर का साया,
कब कहाँ कैसे खो जाए,
कौन हमें बतलाने आए,
क्षणभंगुर जीवन, सब जानें,
फिर भी देह को सब कुछ मानें,
यही छलावा, यही है माया,
किस ने इसका भेद है पाया,
काया को माटी जो जाने,
परम तत्व को सब कुछ माने,
वही है जागृत, वही है ज्ञानी,
न वह मूरख, न अभिमानी!
अरुण भगत
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👌👌👌
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धन्यवाद, अंकित जी!
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Amazing sir
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Thank you very much, Sahil dear, for your generous words of praise! God bless you!
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Nice sir
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Very True…👍👍👍
Well written Sir👌👌👌
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Thank you very much, Meenakshi Ma’m! Stay blessed.
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