प्रेम का हो प्रवाह सरल

दिल को दिल की राह हो,

न और कोई चाह हो,

हृदय से हृदय मिले,

न हों शिकवे या गिले,

प्रेम का हो प्रवाह सरल,

भावनाएँ कोमल और तरल,

मानवता का प्रसार हो,

स्नेह सागर अपार हो,

वैमनस्य भाव को सब तजें,

चैन की मोहक बंसी बजे,

विषय-विकार सब तजें,

ईश्वर-तत्व को भजें,

चरित्र हो सर्वत्र सबल,

सद्भाव समभाव हों प्रबल,

मानव जाति का उत्थान हो,

जगत का कल्याण हो!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

12 thoughts on “प्रेम का हो प्रवाह सरल”

  1. बहुत सुंदर लगी प्रेम की परिभाषा।🙏🙏🙏

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    1. धन्यवाद, ममता मैडम, आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए! जीती रहिए!

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