ज़िंदगी वही जो इसे हम बनाते

कैसे बीती ज़िंदगी यह पता ही नहीं चला,

समझ नहीं आया यह कैसी है बला,

पकड़ना चाहा तो हाथों से फिसली,

जैसे कौंध कर लुप्त हो जाती बिजली,

जीना चाहा तो खड़े कर दिए नित नए व्यवधान,

जिनका न छोर पकड़ पाए, न मिला समाधान,

कभी लगे जैसे है कोई अंतरंग सहेली,

कभी यह बन जाए एक अबूझ पहेली,

कभी लगे रिमझिम बारिश की बूँदों की तरह सहज,

कभी लगे जैसे जी का जंजाल हो महज़,

कभी जब जगाई इसके नाम की अलख,

तो दिखलाई इसने अपने महात्म्य और विराटता की झलक,

कभी जब स्वार्थों के संकुचित दायरों में गए सिमट,

विषय-वासनाओं के नाग बनकर यह गई लिपट,

कभी प्रकाश पुंज तो कभी घनघोर अंधेरा

जिसका न दिखे कोई अंत, न हो सवेरा,

शायद ज़िंदगी वही है जो इसे हम बनाते,

यह हम पर है कि क्या इसकी बगिया हम सजाते,

या फिर उजाड़ते इसका भव्य उद्यान,

यह हम पर ही है कि बनेगी यह बोझ या वरदान!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

6 thoughts on “ज़िंदगी वही जो इसे हम बनाते”

  1. बहुत खूब!बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सर!

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